माहवारी
By Anisha Jain
आज फिर मेरी योनि से बहा रक्त
थकान के कारण मैं हुई अशक्त।
बही आज फिर से लहू की लाल धारा
पाँच दिनों तक समाज ने कर लिया मुझसे किनारा।
जिस माहवारी से मानव पाता है जीवन दान
उसी को बीमारी कह करते इस चक्र का अपमान।
माहवारी में भगवान भी बना लेते मुझसे दूरी
अकेले कमरे में दर्द सहने की ये कैसी मजबूरी।
विवश हो जाती मैं गंदा वस्त्र करने को इस्तेमाल
बाँझ जाऊँ मैं पुकारी अगर बहे ना मेरा ख़ून लाल।
जिस ख़ून के धब्बे ने मुझे कली से बनाया फूल
उसी माहवारी को कोसने की करते सब भूल।
शक्ति का स्वरूप है मेरे जैसी हर नारी
टेस्ट मैच के दिनों में बन जाती मैं बेचारी।
अनजान बन जाता माहवारी से सारा समाज
अपना दर्द बयान करने को मिलते नहीं मुझे अल्फ़ाज़।
पैड माँगने पर पकड़ा देते मुझे थैली काली
मेरे आत्मसम्मान पर लगा देते प्रश्नचिन्ह ख़ाली।
जिस माहवारी से तुम सिकोड़ते नाक भौंह
उसी लहू ने जलायी तुम्हारे जीवन की लौ।
इसी ख़ून की बूँद ने सींचा तुम्हारा शरीर
फिर क्यों नहीं समझते तुम एक नारी की पीर।
माहवारी श्राप नहीं पर एक क़ीमती वरदान
मानव का अस्तित्व इससे नारी जाति का ये अभिमान।
By Anisha Jain

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