मानव आप खुदको बदलो !
By Sayandipa Panda
क्यों तुम हमें अपनाते नहीं हो ?
जैसे हैं वैसे रहने देते नहीं हो !
हर बार हमारी कमज़ोरियों पर
तुम ऊँगली उठाते रहते हो ।
क्यों न अब हमारे बजाय
मानव तुम खुदको बदलते हो ?
चाहे स्कर्ट पहने या सारी
हमारी चरित्र ही हर बार दाँव पर लगती है ,
क्यों न अब अपनी बेटियों को
टोकने से पहले
मानव आप आपनी सोंच बदले ,
मानव आप खुदको बदले ।
रात को बाहर नहीं निकल सकती ,
एक कैदी की तरह हो गई है ज़िंदगी
अब दरखास्त है आपसे कि
जीने दे हमें अपनी ज़िंदगी ।
क्यों न अब हमारे बजाय
मानव आप खुदको बदलते हो !
मत समझो दुर्बल नारी को
यह कुछ भी कर सकती है
जिसे कहते हो अबला नारी
जन्म वही तो आपको देती है |
क्यों न अब इन्हें बदलने के बजाय
मानव आप खुदको बदलते हो !
सुनो उतार दो अपनी सर से
अच्छे होने का बोझ ,
क्यों तुम इस समाज के लिए
सह लेती हो तानों का बोझ ?
हर बार गलती तुम्हारी नहों होती
फिर क्यों ऊँगलियाँ बार-बार तुम पर है उठती ?
हम तुम्हारे लिए खुदको नहीं बदलेंगे
चाहे जो भी कर लो ऐसे ही रहेंगे
हमारे भी कोई जुनून है
हमें भी उड़ना है
हमें तुम्हारे तरह नहीं बनना है ।
क्या कसूर था हमारा
जो आपने हमें अपनाया नहीं ?
क्या गुनाह की थी हमने
जो आपने हमें गिरने से बचाया नहीं ?
ख़फा है हम अब दुनिया से
क्योंकि मानव आप खुदको बदलते नहीं ।
अब और गुनाह मत करो
कहीं बहुत देर न हो जाए ।
अब हमारी और झूठी परवाह मत करो
कहीं इसमें सबकी खुशी न खो जाए ।
पर सबकी खुशी लौटा सकते हो तुम
अगरअपनेआपकोबदलसकतेहोतुम।
By Sayandipa Panda

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