मातृभूमि - बुंदेलखंड
By Dharmendra Singh Thakur
जलवा नहीं दिखाना है
ना ही अकड़ दिखानी है
ना ही घमंड करना है
ना अहं पालना है
ना वहम पालना है
ना आसमान में उड़ना है,
किसान के बेटे हैं
हमें अपनी जमीन पसंद है
अपनी माटी अच्छी लगती है
हमें मालूम है हम माटी से बने हैं
और एक दिन माटी में ही मिलेंगे,
हाँ हमें इंग्लिश पसंद है
पर प्यार अपनी माई की बोली
बुंदेली से ही है.
हां गाँव वाले हैं
पर गवार नहीं है.
अब शहर और गांव
दोनों अच्छे लगते हैं
दिमाग दिल्ली में रहता है
पर दिल बुंदेलखंडी ही है.
By Dharmendra Singh Thakur

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