माटी का खिलौना
By Ankita Pradeep
मेरी माटी का खिलौना
कच्ची उम्र में कच्ची मिट्टी का घरौंदा
मेरे नन्हे हाथों से वो संभालता न था
मेरा खिलौना मेरी समझ और उम्र से भी बड़ा था
मेरे हाथों ने अभी रोटी ठीक से तोड़ना सीखा भी नही
मां ने बेलन थमा दिया
मैंने बस अपना नाम लिखना ही सीखा था की
बाबा ने कलम छुड़वा दिया
मेरे घरौंदे में मुझे गाड़ी रखनी थी, मां बाबा ने दूल्हा दुल्हन रखवा दिया
मेरे सभी छोटे और बड़े सपनों को
सबको बस एक ही जगह सीमत कर दिया
मां बाबा ने मुझे किसी और के घर भेज दिया
घरौंदे में अब कुछ और लोगों को रख दिया
मेरे छोटे हाथों में उन्होंने और भी बड़ा घरौंदा रख दिया
मेरा खिलौना अब हकीकत बन गया
और हाथ में रोटी, बेलन, बर्तन रह गया
गाड़ी की चाभी की जगह किसी और के घर की चाभी रख दी
मेरे सपनो को सिर्फ उसके सपनो की डोर संभालने को दे दी
मेरे अल्हड़पन को समझदारी में बदलने से पहले ही मां बाबा थक गए
मुझे खुद पर बोझ समझ किसी और के हवाले कर गए
मजने गले में सोने का पदक चाहा था
सोने का मंगलसूत्र दे दिया
मुझे मेरे हिसाब से किस्मत लिखने के बजाए किसी और को उसका लेखक बना दिया
मां बाबा ने मुझे बताया कि मेरे घरौंदे का नाम उन्होंने ससुराल रख दिया ।
मैंने तो माटी का खिलौना बनाया था
कच्ची उम्र में खेलते हुए बड़ा सपना सजाया था
सपना सजाया था की अपना घरौंदा खुद बनाना है...
मुझे अपना सपना और घर खुद सजाना था....
मां बाबा का नाम रौशन करना था
मुझे खेलना और बहुत पढ़ना था
मेरी नादानी को काश बचपना ही समझते
मुझे बड़ा होने देते और मेरी उड़ान देखते
मेरा घरौंदा मैं खुद बड़ा करती,
अपने साथ साथ उनके सपनों को भी पूरा करती
मां बाबा काश आप मुझे बोझ न समझते
काश मेरे घौरंडे का नाम ससुराल न रखते।
By Ankita Pradeep

Comments