माखन-मिश्री
By Vani Bansal
चलो एक बार मान लेते हैं कि तुम मेरे कभी थे ही नहीं
कि उन छह दिनों में मुझे जो लगा वह सिर्फ़ मुझे लगा
और तुम उस मिश्री की तरह जो कभी माखन में मिली ही नहीं
चलो एक बार मान लेते हैं कि घन्टों लम्बी बातों में
जितना मैं तुम्हें जानना चाह रही थी उतना तुमने कभी बताया नहीं
कि मेरे खतों में जो मैं इज़्हार कर रही थी वह इज़्हार तुम तक कभी पहुँचा ही नहीं
चलो एक बार के लिए मान लेते हैं की मुझे जो था वह इश्क़ नहीं बस चाहत थी
तुमसे ज़्यादा तुम्हें अपने साथ चलने की उस ख्वाहिश ने मुझे यूं जकड लिया था
जैसे मानो सर्दी के मौसम में ऊन के बुने हुए स्वैटर ने
चलो मान लिया मैंने कि मैं गलत थी
ट्रेन की रफ़्तार की तरह चलने नहीं दौडने लगी थी
मगर यह सब मान लिया तो यह भी मान के देखना ज़रा
हां मेरी कोशिशें गलत थी मगर चाहतें नहीं
हां मेरी रफ़्तार गलत थी मगर मेरा इश्क़ नहीं
हां मेरी नाराज़गी गलत थी, तुमसे तुम्हें मांगना भी गलत था
लेकिन तुमसे मांगने से पहले मैनें बिन मांगे खुद को समर्पित भी तो कर दिया
तुम्हारी चाहतों में मैंने खुदको भी तुम्हारे ही रंग में ढाल लिया
तुम्हें जानने में मैनें खुद को ऐसे खो दिया
मानो इंद्रधनुश ने बादलों को हमेशा के लिये छोड दिया
चलो एक बार मान लेते हैं कि तुम मेरे कभी थे ही नहीं
लेकिन मुझे बिन मांगे-पाके तुमने यूं छोड दिया
मानो मिश्री कभी माखन की थी ही नहीं
By Vani Bansal

Comments