मांग रही क्यों अमृत दुनिया?
By Pranjali Tiwari
मांग रही है अमृत दुनिया, मुँह लगा कर जहर का प्याला,
जबरन सिंदूर बाँट बाँट कर सबकुछ राख राख कर डाला।
निज सपनों की डोर छोड़कर अपना लो सपने अनजाने,
निज स्वाभिमान की बलि चढ़ा दो,कहलाओगे तभी सयाने।
प्यार जिन्हें है चट्टानों से, विकराल भवंर और तुफ़ानों से,
उन को कौन बचाये बोलो, दुनिया के कोमल तानों से?
प्रेम जिन्हें है तलवारों से, तपती धूप और अंगारों से।
उनको कौन बचाये बोलो, महकते फूलों के हारों से?
बिकते जहाँ रिश्ते पैसों से, मोल वहाँ क्या जज्बातों का?
शर्म नहीं उजाले से जिनको, भय वहाँ क्यों हो रातों का?
अदा नहीं मालूम है जिनको, झूठी अदब को ढोने का
बताओ क्यों बोझ उठायें वो, झूठे रिश्तों को खोने का?
रंग छीन के इस जीवन का, किस जीवन मे रंग भरें वो
खुद को बेरंग बना कर, औरों के रंगरेज बने क्यों?
आडंबरों से कभी अपने,जिसने छला नहीं ईश्वर(निज आत्मा) को,
ढोये भला क्यों वो तुम्हारे स्वादानुसार बदलते नियमों को?
By Pranjali Tiwari

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