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माँ, मैं तुम्हारे जैसी माँ बनती जा रही हूं....

Nov 23, 2022
3 min read

Updated: Jul 30, 2025

By Seema Sharma


माँ.. पन..कोई शब्द है क्या ?

नहीं जानती...

पर जो कहना चाहती हूं

वो इसी शब्द से कह पाऊंगी।

ये अचानक एक अलग ही

खयाल है मन में,

मन आजकल...

माँ..पने.. से ओतप्रोत है।

कैसे,क्यूं नहीं पता ठीक से, परन्तु कोशिश कर बताती हूं।


बच्चों के पास आई हूं ना,

ममतामई हो गई हूं...

दो दो बच्चों की माँ जो बन गई हूं...

बेटे की तो थी ही,

अब बहू की भी हो गई हूं।

दिन रात की उठा पटक नें इनको,

मानो अपना भी नहीं रहनें दिया है।

काम का जैसे अंबार सा है इन पर,

हर वक्त भागते दौड़ते ही नज़र आते हैं।

मानो यही जीवन हो।


शनिवार, इतवार आराम की चाह में...

न जाने कब निकल जाते हैं इनके।

और सच कहूं...

आराम भी नहीं कर पाते हैं।

कर पाते हैं तो बस काम।

वो भी हफ्ते भर का..

कपड़े धोने, प्रेस करनें का...

अलमारी ठीक और ‘पेट’ को निहलाने का..

दोस्तों के साथ मिलने का..

फ़ोन पर बतियाने का।


ऐसे ही फिर, पलक झपकते,

आ जाती फिर रविवार की रात...

और फिर शुरू हो जाती

अगले हफ्ते, उठा पटक,

कशमकश, सोमवार से।

ऐसे ही, बस वैसे ही,

भागते दौड़ते ऑफिस जाना,

वापस आकर खाना खाना,

इधर उधर की कहना, बतियाना,

और फिर सो जाना।


इसी बीच बना प्रोग्राम कुर्ग जाने का।

कार से ‘पेट’ ब्रूनो को भी, साथ ले जाने का।

‘ब्रीड’ से वो ‘इंडी’ है,

पूरी कागज़ी कार्यवाही से,

एडॉप्ट किया है उसे।

पूंछ हिलाता, आँखें मटकाता

बड़ा प्यारा लगता है वो।

हर चीज़ को सूंघना,

और सूंघ कर छोड़ देना,

मानो जन्मसिद्ध अधिकार हो उसका।


थोड़ा सा ही लेता हमसे

परंतु देता इतना सारा है,

कि मन गदगद हो जाता है।

कभी सोचती हूं...

भगवान न्यायप्रिय कैसे ?

समझ नहीं पाती हूं,

हम, मतलब इंसान...

तो जैसे बस लेने के लिए ही

बैठे हैं,

कुदरत से, भगवान से,

प्रकृति की हर सृष्टि से,

और अब अपने ‘पेट’ से भी।


ये फिलहाल यहीं छोड़ते हैं,

अभी तो हम जा रहे हैं कुर्ग।

शुरू की है तैयारी...

कुछ ले जाने की,

कार में, बच्चों को खिलाने की।

सोचा थोड़ा चिवड़ा बनाती हूं चने मुरमुरे का नमकीन भी।

फिर सोचा मठरी तो होनी ही चाहिए,

और संग हींग का अचार भी,

उस पर लगाने को।


तीन कैरियां आईं।

दो पकी पीली पीली निकलीं,

बची एक कैरी का ही सही,

हींग का अचार बनाया।

अब मीठे में क्या करूं?

तभी पति बोले...

बेसन के लड्डू बना लो।

अरे वाह,मेरे माँ..पन के साथ

शायद इनका भी पिता..पन, हिलोरे मार रहा है।


ऐसा सोचते सोचते,

बेसन के लड्डू भी बना डाले

दोनों ने आधा आधा चखकर

बाकी सारे बच्चों के लिए, पैक कर डाले...

हम दोनों को ही,

जैसे मममत्व ने आ घेरा था।

ऐसा लगा, बच्चों को लाड़ लड़ाने का,

रस्ता भी मानो पेट से ही जाता था।

जो भी हो, सुकून बड़ा था उस पल में।


फिर अचानक यूं लगा,

जैसे माँ...मैं तुम्हारी तरह ही,

माँ बनने लगी थी।

हॉस्टल से आती थी जब घर, क्या कुछ नहीं करतीं थीं तुम तब,

ये खा ले, वो ले ले ...

तब नहीं समझ पाती थी,

जो अब समझ पाती हूं।

अब जब तुम मेरे पास नहीं...

मैं जैसे तुम्हारे भावों को

जी रही हूं।


माँ, मैं तुम जैसी होती जा रही हूं।

देखो ना माँ,तुम जहाँ हो वहाँ से देखो..

तुम जैसे ही माँ,हर पल बच्चों की चिंता करती हूं,

इनमें ही जैसे समाई रहती हूं,

क्या क्या बनाकर खिलायूँ,

हर पल यही सोचती रहती हूं,

उनकी क्या तकलीफें हैं,

महसूस करती रहती हूं।


और फिर इस अनुभूति से अभिभूत हो जाती हूं,

कि माँ... मैं तुम्हारे जैसी माँ बनती जा रही हूं।


By Seema Sharma





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