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महामारी की मार

Oct 28, 2022
2 min read

By Herratdeep Singh


हंसते खेलते रहते थे, किसी से कुछ ना कहते थे।

यारों के संग महफ़िल सजती थी, शादियों में शहनाईआं बजती थी।

सब अपने काम पर जाते थे, गुणगान प्रभू के गाते थे।


फिर एक दिन एक केस आया, बहुत ही बुरा वो फेज़ लाया।

कोई कोरोना नामक प्राणी था, करता बहुत ही हानी था।

दवाईओं से ना मरता था, तंग बहुत ही करता था।

बुद्धि जीव भी हैरान थे, देश वासी भी परेशान थे।


वैसे तो वो दिखता नहीं, प्रभाव तो उसका विशाल था।

ना जाने कैसा ग्रहण लगाया, जीवन पर जो खुशहाल था।


सबको घर में कैद किया, कारोबार भी हुए बंद।

कहावत सच्ची दिखने लगी कि, पैसों से ही है जीवन आनंद।





सबके मुँह पर नकाब लगवाया, सैनीटाईज़र से भी हाथ धुलवाया।

जो इतनी देर तक संस्कृति ना सीखा पाई, वो कोरोना ने सिखलाया।


देशवासी भी प्रवासी बने, उलझ गए वो सुलझे तणे।

सरकारों के आश्वासन थे, मानो खोखले भाषण थे।


७० साल से हमारा खाया, अब ४ महीने ना हमें खिलाया।

काहे का ये लोकतंत्र है, बस मंत्रिओं के हाथ यंत्र हैं।


अब अगली बार जब नेता आए, लेना उसे खटिया पर बिठाए।

उससे पूछना बताओ मेरे भाई, वोट मांगते हुए शर्म नहीं आई।


देश में ना तो चुनाव था, लेकिन फिर भी मांसिक तनाव था।

जिसके चलते ऐसी शिकस्त खाई, हंसती खेलती जान गवाई।

सबका सब्र एक एन्ड पर था, और इट्स ओके टू टॉक ट्रेंड पर था।


जैसे कोई बुराई है जाती, यह भी एक दिन जाएगा।

कितनी अँधेरी रातों के बाद, फिर सवेरा आएगा।


अपना जज़्बा कायम रखना, उम्मीद भी रखना पूरी।

घर, नौकरी, पैसा सब लौट आएंगे, बस तेरा जीना बहुत है ज़रूरी।।


By Herratdeep Singh




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