महानता की ओर
Updated: Jan 12, 2023
By Aditya Jha
कब तक बालक रहोगे ,
अब तो तुम बड़े हो जाओ ।
रहे बहुत दिन गोद माँ के
आँचल में चेहरा छिपाये ।
क्यों पिता के कंधे पर ,
बैठे हो सर झुकाए।
पकड़ अंगुली पितामह की
नाप डाली पगडण्डियाँ,
मीठे सपने में हो खोते
सुन दादी की लोरियाँ।
दिन हुए बहुत समर्थ होकर ,
स्वयं पांवों पर खड़े हो जाओ ।
आस लगाए बैठे देखो
ग्राम, घर और सारी नगरी ।
बलिदान मांगे मातृभूमि ,
स्वेद, रक्त और अस्थि, चमड़ी ।
मिलता न मौका बार -बार
गुरु, माता -पिता की ऋण चुकाते,
नर पुंगव ही समय शिला पर
पग की निशानी छोड़ जाते ।
गाथाओं में मिले कीर्ति तुम्हारे ,
भले तुम हमसे परे हो जाओ ।
माया मोह की बेड़ियों में,
मृत्तिकामय तन मन भरमाए।
स्वर्ण, सुरा, सुन्दरी का
नापाक बंधन मुस्कराए ।
महावीर जो मन की जीते ,
वेदना सीने में भर कर ।
अंतिम समय तक संघर्ष करते ,
अभिमन्यु सा व्यूहों में घिर कर ।
खुद लिखो तक़दीर अपनी
काल के न मोहरे बन जाओ ।
By Aditya Jha

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