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महा-गाथा

May 7, 2023
2 min read

By Yashovardhan Singh


आज मुझे कुछ बातें करनी हैं। दरसल मुझे एक ख़त लिखना है।

जो ज़ुबान से कभी ना कह पाया, तेरी तार्रूफ में वो सिफ़त लिखना है।

कल तू इसे पढ़ पाए या ना पढ़ पाए, क्या बस मेरा इसपर?

इस दिल में उबल रहा तब से जो, वो मोहातिफ-ए-दस्तखत लिखना है।


तो ये ख़त है उस गुलदान के नाम, जिसके फूल को हम चुप-चाप सींचा करते थे।

ये अल्फ़ाज़ हैं उस किताब के नाम, जिसके पन्नों में हम ख़ुद को मींचा करते थे।

हाँ वोहि जिन्हें देखते ही, उस पल की सारी धड़कनें उनके नाम की हैं हमने।

हाँ वोहि जिनके नाम से अपने नाम तक हम, अक्षर-बा-अक्षर रेखाएँ खींचा करते थे।


जब तुम बात करतीं थीं तो मैं तेरे चेहरे में यूँ खो जाता था,

मानो तेरी अदाओं का हुक्म हो।

वो जब तुम हसतीं थीं तो तेरी आवाज़ को अपने कानों में यूँ क़ैद कर लेने को हो जाता था,

मानो इन हवाओं का हुक्म हो।



जिन मुलाक़ातों ने बेक़रारी की बुन्यादें रखीं, वो सब मुलाक़ातें दोषी हैं।

वो मीठी-मीठी चंचल तेरी, सारी बातें दोषी हैं।

वो रातें जिनमें रिवईंद कर कर के, तेरी सब यादों को जिया हुँ मैं,

वो करवट बदलते गुज़र गयीं जो, सारी रातें दोषी हैं।


जब तुम थक कर अनजाने में ही, मेरे काँधे पर अपना सिर रख देती, और मैं

तेरी वस्ल की चादर में लिपटे बिना, बस खड़ा राह जाता।

जो तुम गलियारों में कभी मिल जाया करतीं, और हाल पूछतीं मेरा और मैं

तेरे कुरबत के समंदर में सिमटे बिना, बस खड़ा राह जाता।


और उसके बाद भी तेरी ओर से प्याम-ए-ख़ैरियत ज़रा कम आए।

और जब आए तो, जवाब में, मेर दिल के सच नहीं आए।

न तुमने सुनना चाहा कभी, ना मैं खोल पाया दरवाज़े।

मेर आहट तुझ तक पहुँची ही नहीं, सदाओं के भी हो गये गुम साए।


ये कुछ दर्द हैं जो तुझ तक कभी पहुँचे ही नहीं।

क्यूँकि तेरे-मरे घागे तूने ढंग से कभी खींचे ही नहीं।

शायद यूँ कि तुझे मालूम ही नहीं कि उन धागों के सिरे हैं किधर।

या यूँ कि मुझ बेख़याल के सम्त-ए-गिले सब हैं किधर।


कोई सवालात कर सकूँ तुझसे मैं, वो हैसियत मेरी नहीं अभी।

कि तुझे पैग़ाम पहचाने को कोई, लड़ाई ही कहाँ की कभी।

क्या माँगूँ तुझसे कुरबत का वास्ता, ये बतला,

कि तेरी तारीफ़ में महफ़िल-ए-इकरार सजाई ही कहाँ थी कभी।



ख़ैर ये कुछ बातें तो लाज़मी थीं करनी, मेरी चेष्ठा-ए-वस्ल की शान में।

कि हाल-ए-दिल है क्या मेरा, तुझे भान था, मुझे भान है।

एक इशारा। हाँ बस एक इशारे की, था मैं तलाश में।

खटखटाए जा रहा मैं प्रशंबद्ध आकाश में।


मेरी सब काली भरी घटाओं से एक रोज़, ऐतबार की बूँदें बरसेंगी।

मैं उस ही दर्या पे जा बैठूँगा जब तेरे इंतेज़ार में आँखें तरसेंगी।

वो बूँदें जब तेरी ज़ुल्फ़ों पे गिरें, तो मस्तिष्क मूँद के चली आना।

जब महसूस हो मेरा इंतेज़ार रूह को तेरे, तो सब वादे भूल के चली आना।


इस कलाम से बस अब यही फ़र्यद है, की एन अल्फ़ाज़ों को पी जाना।

ऐ काग़ज़ मेरी इज़्ज़त रखना और ख़ामोशी में जी जाना।

कि जो आग सुलगा के गयीं हैं वो सब इन लफ़्ज़ों में दहकती रहे।

और हवा के हर एक कण में वो तारीक क़यामत तक महकती रहे।


By Yashovardhan Singh







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