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मयखाना

Nov 1, 2022
2 min read

Updated: Jan 7, 2023

By Shivam Singhal


हूँ बैठा मैं मयखाने में;

ज़ाम दर ज़ाम पिये जा रहा हूँ,

होश में हूँ मैं फिर भी;

होश गवांने की कोशिश किए जा रहा हूँ।

एक हसरत सी थी मन में;

उसे ज़ाम के साथ मिला रहा हूँ,

एक घूँट में ही पीकर अब;

उसे मिटाने की कोशिश किए जा रहा हूँ।

कितना अच्छा लगता है जब;

दुनिया तुम्हारा सच भी सुन लेती है,

नशे में बोल रहा है;

ये सोच सब सह लेती है।




इक अदब सी होती है मुझमें कहीं;

तुमसे मिलने की कोशिश किए जा रहा हूँ,

होश में हूँ मैं फिर भी;

होश गंवाने की कोशिश किए जा रहा हूँ।

महसूस होता है खुद को;

खुले आसमान में उड़ रहा हूँ,

न कोई डर है ना ही सीमा;

बस ज़ाम-दर-ज़ाम पी रहा हूँ।

है एक अजीब सी आरजू मेरे मन में;

दबाने की कोशिश किए जा रहा हूँ,

पाना मुमकिन नहीं है तुम्हे;

फिर भी जिद है तो कोशिश किए जा रहा हूँ।

पीना न था जिसे मुझे

घूँट-दर-घूँट पिए जा रहा हूँ,

होश में हूँ मैं फिर भी;

होश गवांने की कोशिश किए जा रहा हूँ।

अमृत सा लगता है स्वाद तेरा;

होंठों से तेरा रसपान किए जा रहा हूँ,

गमों के दरिया से बाहर निकलने की;

एक कोशिश किए जा रहा हूँ।

है अच्छा लगता मुझे साथ तेरा;

हाथ में लिए तुझे चला जा रहा हूँ,

लड़खड़ा रहे हैं कदम मेरे;

फिर भी संभलने की कोशिश किए जा रहा हूँ।

साथी है अब तू मेरा;

तुझे चूमे चला जा रहा हूँ,

दुनियाँ की नजरों में है पाप जो;

पुण्य मैं वो किए जा रहा हूँ।

होश में हूँ मैं फिर भी;

होश गवांने की कोशिश किए जा रहा हूँ।


By Shivam Singhal





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