मयखाना
Updated: Jan 7, 2023
By Shivam Singhal
हूँ बैठा मैं मयखाने में;
ज़ाम दर ज़ाम पिये जा रहा हूँ,
होश में हूँ मैं फिर भी;
होश गवांने की कोशिश किए जा रहा हूँ।
एक हसरत सी थी मन में;
उसे ज़ाम के साथ मिला रहा हूँ,
एक घूँट में ही पीकर अब;
उसे मिटाने की कोशिश किए जा रहा हूँ।
कितना अच्छा लगता है जब;
दुनिया तुम्हारा सच भी सुन लेती है,
नशे में बोल रहा है;
ये सोच सब सह लेती है।
इक अदब सी होती है मुझमें कहीं;
तुमसे मिलने की कोशिश किए जा रहा हूँ,
होश में हूँ मैं फिर भी;
होश गंवाने की कोशिश किए जा रहा हूँ।
महसूस होता है खुद को;
खुले आसमान में उड़ रहा हूँ,
न कोई डर है ना ही सीमा;
बस ज़ाम-दर-ज़ाम पी रहा हूँ।
है एक अजीब सी आरजू मेरे मन में;
दबाने की कोशिश किए जा रहा हूँ,
पाना मुमकिन नहीं है तुम्हे;
फिर भी जिद है तो कोशिश किए जा रहा हूँ।
पीना न था जिसे मुझे
घूँट-दर-घूँट पिए जा रहा हूँ,
होश में हूँ मैं फिर भी;
होश गवांने की कोशिश किए जा रहा हूँ।
अमृत सा लगता है स्वाद तेरा;
होंठों से तेरा रसपान किए जा रहा हूँ,
गमों के दरिया से बाहर निकलने की;
एक कोशिश किए जा रहा हूँ।
है अच्छा लगता मुझे साथ तेरा;
हाथ में लिए तुझे चला जा रहा हूँ,
लड़खड़ा रहे हैं कदम मेरे;
फिर भी संभलने की कोशिश किए जा रहा हूँ।
साथी है अब तू मेरा;
तुझे चूमे चला जा रहा हूँ,
दुनियाँ की नजरों में है पाप जो;
पुण्य मैं वो किए जा रहा हूँ।
होश में हूँ मैं फिर भी;
होश गवांने की कोशिश किए जा रहा हूँ।
By Shivam Singhal

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