ममता का पल्लू
By Santosh Kumar Koli
बचपन के ढलकते आँसू,
पल्लू से पट होते साफ़ |
झूठा ज़ख़्म अक्षि का,
और वो पल्लू की भाप |
गीली पट्टी पल्लू की,
पल में उतरता ताप |
पल्लू की चुटकी से गर्म चीज़,
उठती अपने–आप |
सकल हाथ न लिख सकें,
मैं क्या लिख पाऊँ ?
कैसे बताऊँ,शब्द कहाँ से लाऊँ,
पर सबको सुनाऊँ ?
बाहर से मज़बूत,अंदर मजबूर,
माँ पल्लू बिन,रह नही पाऊँ |
सब कुछ है मेरे पास,पर माँ का पल्लू,
कहाँ से लाऊँ?
पल्लू छाया पर शेषनाग,
शय्या दर-किनार |
पल्लू का पल्लू पकड़कर,
ब्रह्मांड हो गया पार |
शोख़ अदाएं,पल्लू साए,
धूप-छाँव रहा निहार |
शोभित छवि पर सकल देव,
देवलोक रहे वार |
सबसे महफ़ूज़,साधित,
जगह है पल्ला ओट |
पल्लू की परमा परम,
काल भी खाकर जाए चोट |
रूठने पर पल्लू से खुलते,
सिक्के,सिलवटी नोट |
खून सनी पल्लू की पट्टी,
याद करो बचपन की चोट |
पल्लू का मोल न तोल,है प्रेम हिलोल,
ऋण बेहिसाब |
पल्लू की भाषा बच्चा समझे,
छवाई नायाब |
कोई नाप सका न भाँप सका,
पल्लू का ताब |
पल्ला या तो पसरा नहीं,
पसरा तो बच्चे के लाभ |
By Santosh Kumar Koli

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