मनुष्य जीवन
By Sanat Raj
जिसने भी माना वो अनंत है,
दिखता समीप उसका अंत है,
यहां तो सभी नश्वर है,
वरना वो तो ईश्वर है,
रोकना चाहा समय का चक्र,
सरल रास्ता भी हो गया वक्र,
हर तरल होता अमृत नहीं,
हर स्थिर शरीर मृत नहीं,
कुछ अपने ध्यान में मग्न है,
कुछ के सोच अत्यंत नग्न है,
रिश्ते यहां अब क्षणिक है,
कद्र लोगों की तनिक है,
लोभ रिश्तों की धूरी है,
कितनो की ख्वाहिशें अधूरी है,
जंग यहां बुद्धि और बल का,
इंतजार सभी को कल का,
आज में सभी मरते है,
कदम बढ़ाने से डरते है,
जीत गया वो जो रुका नही,
उड़ गया वो जो झुका नही,
समेटे है दिलों में अतीत का मलाल,
उठते है जहन में अनगिनत सवाल,
पर वो हकीकत का कड़वा घूंट पीता हैं,
इस संसार में मनुष्य ऐसे ही जीता है।
By Sanat Raj

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