मन का रंग
Updated: Jan 12, 2023
By Kanchan Joshi
मन का रंग न देख सका ,
गोरी चादर की चाहत में,
न जज़्बातों की फ़िक्र,
न भावनाओं की क़द्र,
सफेदी का उबटन दे दिया।
मन और उबटन का क्या मेल,
यदि,
मन उबटन न बन सका,
उबटन मन न पढ़ सका।
लेपों की प्रतिदिन करवट ली,
स्वयं के अस्तित्व को ढका।
अंधकार है वो यौवन
जिसके मन न जले भावों का दीया ,
न जज़्बातों की फ़िक्र,
न भावनाओं की क़द्र,
सफेदी का उबटन दे दिया।
कभी सोचती हूँ,
मौन रहती, कुछ न कहती,
प्रेम हो तो सादगी से
चादर हो कोई भी लिपटी।
रंग रात सा, पर मन लालिमा,
अलभ्य सोच की कैसी गरिमा,
कामनीयता का बोध कराते
सब छोड़ अनुचरी सा जीवन जिया।
न जज़्बातों की फ़िक्र,
न भावनाओं की क़द्र,
सफेदी का उबटन दे दिया।
By Kanchan Joshi

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