मजबूर हुए घर से दूर हुए
By Herratdeep Singh
जिस काम को मैं हद्द से चाहता हूँ, उस काम में अवसर ना पाता हूँ।
जिसे पाने के प्रयास में कदम आगे बढाता हूँ, फिर इस जग में मूर्ख कहलाता हूँ।
निराश सा होकर रह जाता हूँ, फिर एकांत में बैठ जाता हूं।
एक मैं फिर तरकीब लगाता हूँ, एक विज्ञापन को अपने मन को आकर्षित करते पाता हूँ।
मेरी टूटी हुई उमीद अब सेहज ही जुड़ते जा रही थी, भविष्य सवारने की जादूई छड़ी मेरे समक्ष आ रही थी, थी वो कैनेडा के वीज़ा पाने की मशहूरी जो इतना मन ललचा रही थी।
मैं उस मौके को अपने भविष्य के लिए एक अव्वल अवसर बता रहा था, अगले ही दिन पिताजी से कहकर सलाहकार के पास जा रहा था।
तीसरे ही महीने सात बैंड का अंक परिणाम वाले कार्ड पर लगाया था , फिर विदेश जाने की तैयारी में खुद को व्यस्त पाया था।
उड़ान के दिन साथ लाखों आशाएं उडी थीं, मेरी उन आशाओं के साथ माँ बाप की उम्मीदें जुडी थीं।
माँ ने गहने गिरवी रख मेरे लिए कर्ज़ा उठाया था, पर इस चीज़ का एहसास एक पल ना मुझे करवाया था।
पिता की आंखे नम थी और माँ का दुपट्टा गीला था, हवाई अड्डे के द्वार थे खुल चुके ना रुकने का मौका मिला था।
सपने अपनों को एक नयी उड़ान मिलने वाली थी, साफ थी होते दिख रही जो किस्मत की चादर काली थी।
सोच कर वहां से निकला था कि रोकर नहीं दिखाऊंगा, आँखों के सब नल बंद कर दिल पर पत्थर रख पाऊंगा।
सफलता पूर्वक मैंने अपने भावों को छिपाया था, मैं अंदर से तो उखड़ा हुआ बाहर से फूल खिलखिलाया था।
वहां के किसी भी पिज्जे को अपने कुलचे के बराबर न पाया था, तीन दिन रोटी उससे खायी जो साग माँ ने बनाया था।
मन को ना भा पाया वाहा का कोई भी स्नैक, सच कहा था किसी ने के वहां गोरे रंगो में दिल हैं ब्लैक।
फिर एक रात की सोच में खुदको परेशान करे जा रहा था, क्या यही हैं वो अच्छे दिन जो मैं अपने लिए चाह रहा था।
सरकार को था बदलना कंधों पर ज़िम्मेदारी भारी थी, मेरी ही तरह हर युवा ने करली पूरी तैयारी थी।
कमल पर मौहर लगाएंगे और हाथ को थप्पड़ पड़ना था, रोजगार में वृद्धि हो सके बस ऐसा कुछ करना था।
अगरहमारीयेसरकाररोजगारपैदाकरदेतीभरपूर, कितनीहीलाखोमाओंकीतरहआजमेरीमाँभीनाहोतीअपनेबच्चेसेदूर।।
By Herratdeep Singh

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