मजदूरों पर कविता
By Shivam Mishra
मजदूरों पर नहीं लिखी जानी चाहिए कोई कविता
ये कोई नेता, अभिनेता, खिलाड़ी, व्यापारी नहीं हैं
कि दुनिया इन्हें याद करे
ये देश बचाने वाले भी नहीं हैं, कि तिरंगे में लपेटा जाए इनका शरीर
और दी जाए तोपों और नम आँखों से सलामी
ये तो महज़ देश बनाने वाले हैं
इनके योगदान का बहीखाता नहीं है कोई
इसलिए इनपर कोई कविता नहीं लिखी जानी चाहिए
इनका कोई नाम, कोई चेहरा, कोई पहचान नहीं है
आधार कार्ड और वोटर कार्ड ज़रूर है, पर मौत के बाद
शव शिनाख्त की जा सके, बस इसलिए
एक परछाईं है बस, इंसान जैसी ही
जिसे हम रोज़ देख कर भी नज़रअंदाज करने
के हुनर में माहिर हो गए हैं
ये परछाईं है उसकी, जिसकी हड्डियों को गला कर
बनती हैं ईंटें
जिन्हें एक और परछाईं, एक के ऊपर एक जोड़ती है
और बनता है हमारा गरीबखाना
ये पहनते हैं अक्सर
फटे, मैले चीथड़े
जिसमें से आती है एक तेज़ सड़ाँध
मरे हुए पसीने, खून, आंसुओं और सपनों की बदबू
जो नथुने फाड़ देती है
ये खाते हैं - लात, घूंसे, गालियाँ, ठोकरें
दिन में एक बार रोटी नमक और
हर पाँच साल में एक बार धोखा
कमबख्त फिर भी, भूख से नहीं मरता कभी कोई मजदूर
कभी नहीं
ये कुचले जाते हैं
मालगाड़ी से, गिरती इमारतों से
फुटपाथ पर किसी निर्दोष दबंग की गाड़ी से
हमारी घृणा एवं अनभिज्ञता से
और अपने सत्य से
इसलिए इनपर कोई कविता नहीं लिखी जानी चाहिए
ये बनाते हैं ऊँची ऊँची ईमारतें, जो जाती हैं देवलोक तक
और ये रहते हैं, कहीं पाताल की सबसे बदबूदार, गहरी खाई में
जहाँ यमराज भी जाना पसंद नहीं करते
ये निर्माणकर्ता हैं, हज़ारों मील लंबी सड़कों के
स्याह काली सड़कें
बिल्कुल इनके भविष्य जैसी
ये बनाते हैं पुल, जो शहर से शहर जोड़ते हैं
मगर नहीं बना पाए आज तक ऐसा पुल
जो जोड़े हमें, इनसे
इंसान को इंसान से
इसलिए इनपर कोई कविता नहीं लिखी जानी चाहिए
ये रोते नहीं है, न ही मुस्कराते हैं
इन्हें गुस्सा भी नहीं आता
नहीं करते ये विरोध अपनी हर रोज़ होती मौत का
नहीं देते ये धरने, नहीं करते आंदोलन अपने हक के लिए
पढ़े लिखे लोगों की तरह
इन्हें नहीं आता बड़े बड़े भाषण देना
अपने फायदे के लिए दंगे कराना,
न उठाते हैं ये शस्त्र, अपनी आज़ादी के लिए
ये बस काम करते हैं, और
काम करते हैं, और
काम करते हैं, और
मर जाते हैं.....
बस इसलिए, नहीं लिखी जानी चाहिए इनपर कोई भी कविता
By Shivam Mishra

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