मजदूर हूं
By Sadhana Joshi
मजदूर हूं मजबूर नहीं
यह तो अपना काम है ।
धरती के हम पुत्र है सारे ,
गगन तले ही धाम है।
गाड़ी बंगला नहीं चाहिए,
ना साजो सामान है ।
एक गठरी बांध चला मैं ,
छोटे से अरमान है।
ताज तख्त भी नहीं चाहिए,
माटी का इंसान है।
मंदिर मस्जिद मैं ही सजाऊं,
काम मेरा भगवान है।
सूट बूट नहीं तन पर मेरे,
धोती गमछा शान है ।
कण-कण से मैं महल बना दूं
यही मेरे अरमान हैं।
भ्रष्टाचार मुझ में नहीं बसता ,
गद्दी का नहीं भान है ।
नित मजदूरी मिल जाए तो, खुशियों भरी हर शाम है।
महलों की कोई चाह नहीं ,
झोपड़ी में आराम है ।
कृत्रिम हवा भी नहीं चाहिए,
वृक्ष तले विश्राम है।
मजदूर हूं मजबूर नहीं ,
यह तो मेरा काम है ।
गैंती बेलचे रोज चलाऊं,
होठों पर मुस्कान है।
By Sadhana Joshi

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