मजदूर ( तालाबंदी के वक्त )
By Sanket Tandel
दो वक़्त की रोटी कमाने आया मैं मज़दूर
सोचता हूँ की किसी तरह घर पोहच जाऊं मैं
जिस शहर को मैंने अपना जीवन दिया
उस बंध पड़े शहर में
खाली पेट कैसे सो जाऊं मैं
मैंने ऊँची-ऊँची इमारते बनाई,
किसी के घर का नौकर बना,
रास्ते पे छोटी छोटी दुकाने बिछाई,
रास्तों पे रिक्षा चलाई,
फ़ैक्टरियों की गंडकी मिटाई,
हॉटलों में मजदूरी निभाई
मगर, जमाने की नज़र में "मजदूर" तो था ही मैं
आज मजबूर भी हो गया हूँ मैं
इससे पहले की कोरोना मार दे
कही भूख और लाचारी से ना मर जाऊं मैं
सोचता हूँ कि किसी तरह घर पोहच जाऊं मैं
By Sanket Tandel

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