मजदूर
By Gopalaram Dheru
नंगे पांव वो चल रहे हैं,
धूप में वो जल रहे हैं,
देश के मजबूत स्तंभ ,
पैदल घर को चल रहे हैं,,
पैदल ही पथ लांघ जाते,
धूप में खुद छांव बनते,,
पांवों में छालों सें भी, दूरियां ये लांघ जाते,
सुबह सवेरे उड़ते पंछी, शाम को घर लौट आते,,
व्याकुलताएं घर की उनको,
खींच कर यूं पास बुलाती,,
अंगारों सी जलती राहें,
उनको कभी ना रोक पाती,,
आंखों में है आंसु उनके,
दिल उनके जल रहे हैं,,
खूब हैं सत्ता के शाषक,
जो गाड़ियों में चल रहे हैं,,
दोष इनका क्या है,
जो पैदल ये यूं चल रहे हैं,,
अमीरों सें पनपे रोग,
क्यूं ग़रीबों को यूं तल रहे हैं ।।
By Gopalaram Dheru

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