मंज़िल
By Komal Paradkar
ए मंज़िल,
तू कहा खो गई है?
चल पड़ी हू राहोमे,
तुम्हारा पता ढूंढने..
गुमसूमसी निगाहें,
प्यार ओर बैचेनी लिए दिलमे.
ए मंज़िल,
बता तो दे ,तू कहा खोगई है..
थक जाती हू अकसर,
बस यूही चलते चलते..
थम जाती हू किसी जगह..
तुम्हारे बारेमे सोचते सोचते.
नज़र तो कही तुम..
आ नही रही हो
पर दिल कहता है..
तुम यही हो.. यही कही हो..
आज नही तो कल ही सही..
ए मंज़िल,
मैं तुम्हे ढूंढकर ज़रूर निकालूंगी.
दिल मैं पूरा विश्वास है,
एक दिन तुम मुझे ज़रूर मिल जाओगी
By Komal Paradkar

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