मौत से पहले कुछ इंतजाम
By Guru Shivam
1.
मकाम मिले ना मिले, ये तो मुकद्दर ही जनता है।
हमने तो मेहनत का दामन थामकर,
कशमकश- सी जिन्दगी में, मेहनतकश बनना सीखा है।।
कोई शिकवा ना रहे खुद से,और कर सकूँ फख्र खुद पर,
हमने जीते- जी, मौत से पहले, ऐसा कुछ इंतजाम करने का ठाना है।।
2.
मुक्कदर भी भला क्यूँ जाने, हमने तो सुना है,
हिम्मते गर मर्द हो तो, मददे खुदा होता है।
मुकद्दर को मिटाकर,
मुकाम की एक नई ,इबारत लिखने की ठाना हैं
हमने जीते- जी, मौत से पहले, ऐसा कुछ इंतजाम करने का ठाना है।।
3.
सफलताओं के आस-प्रयास में, हमनें न जाने कितनी दफा असफलताएँ देखे।
मैदान-ए-फतह के चाह में, रण- संघर्ष के न जाने कितने ही जख्म झेले।
पर असफलताओं के जख्म चाहे कितने भी क्यों न हो,
हमने तो बारंबार गिरकर भी उठना सीखा है।
बस! बोहोत हो चुकी हार, अब तो फर्श से उठकर,
उस अंतहीन अर्श तक का फासला तय कर जाना है।
हमने जीते- जी मौत से पहले, ऐसा कुछ इंतजाम करने का ठाना है।
4.
अब तो जिद है, सर्वश्रेष्ठ से कम कुछ भी मंजूर नहीं।
गर मिली है जिन्दगी, तो मिले जीत भी, वरना
इस खुदगर्जी सी जिन्दगी की कोई वजूद नहीं।
गवाह है इतिहास आज भी, उन रण-बांकुरों का,
जो रच गए इतिहास, बनकर जीवन- संघर्ष के एक जंगी- योद्धा।
है जमाने की रीत यही, करते हैं याद सिर्फ उन्हें ही,
जिन्होंने लक्ष्य की बेदी पर बलि दी हो निज जिन्दगी।
वरना जन्म तो लिये बहुतेरे ही पर औरों के सबूत तक नहीं।
गढ़ जाऊं एक सफल सोपान, इतिहास के उन सुनहरे पृष्ठों पर, कुछ ऐसा बन जाना है।
हमने जीते- जी, मौत से पहले, ऐसा कुछ इंतजाम करने का ठाना है।।
5.
माना कि ये जिन्दगी महज चार दिनों की ही है,
इन चार दिनों के बाद, चौथी होनी भी तय है।
पर चाहे दिन कितने भी हों, जाया नहीं जाएँगे,
इन चार-चुनिंदे दिनों में ही, कामयाबी के बारह चाँद लगायेंगे।
हम रहें, ना रहें कल को, मालूम नहीं,
पर इन चाँदो की चमक ही, हमारी शख्शियत को बताएँगे।
बन सकूँ कुछ इस काबिल, कुछ ऐसा कर जाना है।
हमने जीते- जी, मौत से पहले, ऐसा कुछ इंतज़ाम करने का ठाना है।।
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By Guru Shivam

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