भ्रष्ट परिवेश और जनाधिकार
By Uday Kumar
स्वच्छ परिवेश बनाने को,
आज कोई तैयार नहीं!
कौन पिया?कौन नहीं पिया?
इसका कोई आधार नहीं!!
सभी चाहते हैं बचना,
पीने की लत नहीं मुझमें !
शोर मचाए फिरते वे ,
कहते ये लत सिर्फ है उनमें!!
अपने को नहीं बदलते हैं,
झूठा स्वांग वे रचते हैं!
पीने की ललक बनी सब में,
इसलिए मुखौटा रखते हैं!!
कुर्सी की ललक बनी सब में,
बदलाव की नहीं जरूरत है!!
पीलो जैसे भी पीना है,
हम, तुम, सबको जीना है !
पीने की जिसको लत नहीं,
उसका भी जीना-जीना है?
चाहे जिस खेमा में हों,
हम तुम मिल सब एक रहें!
मरने बालों को मरने दें,
बचने को साधु भेष धरें!!
कुर्सी पर बैठकर पीने की,
ललक चाह सभी को है!
परिवेश स्वच्छ बनाने को,
आज कोई तैयार नहीं है!!
आजादी की वीर सेनानी की,
गाथा सिर्फ गाते हैं,
उनकी चरणों की सौगंध ,
सिर्फ अलफाजों में खाते हैं!
कुर्बानी देने की बारी आने पर,
हट जाते हैं !!
मदहोश सभी पीकर के हैं,
चाहे जाए ये देश कहीं!
निर्माण रुके अपमान ही हो,
पीने को सिर्फ जाम मिले,
कुर्सी की आज लड़ाई है,
जाम-जाम टकराई है!
कौन फूटा?कौन नहीं फूटा?
इसका न आज सफाई है !!
आज बो तुम्हारे पास खड़ा,
अवाम सही इंसाफ करो!
वीर, भगत, आजाद बनोया,
देशद्रोही गद्दार रहो!!
By Uday Kumar

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