भूलना चाहता हूं
By Shuaib Ahmad
अब दिल के घर में किसी और को पनाह देने जा रहा हूं। ऐसा नहीं है की तुझे भूलना चाहता हूं। चाहता हूं तुझे भूलना और दिल से चाहता हूं। क्योंकि शायद एक के रहते हुए दूसरे को जगह देना बहुत मुश्किल है। जानता हूं तुम्हे बहुत बुरा लग रहा होगा लेकिन चाहता हूं तुम्हे बुरा लगे और इतना लगे की मुझसे फिर नफरत हो जाए लेकिन नफरत में खुद को जलाना मत क्योंकि नहीं चाहता तुम जलो।
मेरी ख्वाहिश बस इतनी सी की तुम मुझे नफरत भरी आंखों से देखो। खैर...
ख्वाहिशें किसकी पूरी होती है लेकिन फिर भी ख़्वाब देखने कौन छोड़ता है। ये भीं सोच रहा हूं की अगर मैंने ही तुम्हे दिल से निकाल दिया तो...
तुम्हे दिल में रखेगा कौन?
तुम्हारा हाल पूछेगा कौन?
तुम्हे मेरी नज़रों से देखेगा कौन?
तुम्हारे बालों को शाम लिखेगा कौन?
तुम्हारे गालों को चांद लिखेगा कौन?
पायल की झंकार पे नाज कहेगा कौन?
चूड़ियों की खन खन पे ग़ज़ल कहेगा कौन?
तेरे आने की आहट से मचलेगा कौन?
तेरे जाने की बात से तड़पेगा कौन ?
अगर ये सब कोई लिख भी देगा तो तुझे अपने कोरे कागज़ पर आंसुओ की स्याही से मुहब्बत लिखेगा कौन?
फिर भी तुझे भूलना चाहता हूं।
By Shuaib Ahmad

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