भूखी-प्यासी
By Sangeeta Singh
मैं भूखी-प्यासी,
ख्वाब नहीं बेतहाशा,
सिमट-सिकुड़कर विलीन हो रही हूँ
इस धरामंडल में ।
आस मेरा रास नहीं,
रंग-रलिया में स्वास नहीं,
शेष बचेगें अस्थि-काया,
कौन लाएगा आशाओं का अमृत?
ऐसा कोई दूत नहीं ।
सिमट रही है परिधि मेरी,
मैं भूखी-प्यासी ।
By Sangeeta Singh

Badhiya 👌
Ati sundar
Waah!
Waah! Kya baat 👍
Excellent 👌