भिखारी की कुटिया
By Narjeev Singh
स्टेशन के साथ ही
उसकी टूटी -फूटी कुटिया थी
वहाँ पर एक खाट
कोने में मिट्टी का मटका
एक गिलास एक थाली
पानी के लिए एक लुटिया थी
थाली में कभी पाव
कभी सुखी रोटी होती थी
पिने के लिए तकिये के साथ
बिस्लेरी की बोतल रखी थी
सहारे के लिए उसने
एक सोठी रखी होती थी
बाँस के पाँच -छः डंडो से
बनी वह कुटिया थी
फिल्मी बैनरो से बनी
उसकी छत और दीवारें थी
कभी इसमें ठण्ड
कभी गर्मी होती थी
दशा उसकी बड़ी दयनीय
पहनी उसने धोती फटी थी
शक्ल उसकी काली -कलुटी
राख -कोयले के जैसे थी
ऐसे सलाम करता पुलिसवालों को
जैसे उनसे उसकी जान पहचान थी
By Narjeev Singh

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