बोलता मौन
By Vandna Sonu
तुम ये जो चुप रहते हो
मुझसे नही ख़ुद से ख़फ़ा रहते हो ।
चाह कर भी जो जुड़ते नहीं मुझसे ..क्या कभी मुझसे अलग होते हो?
ग़ैरों की तरह दूर रहते हो ..क्यों फिर अपनो की तरह घुटते हो ?
होंठो को सी लेते हो ..फिर
आत्मा से बोला करते हो ।
क्रूर इतने बनकर...मेरा दिल तोड़ा करते हो ...
और मन ही मन फिर क्यों रोया करते हो ?
फ़िक्र है तुम्हें मेरी..फिर भी बेपरवाह बनते हो ...
डर है तुमको ,मुझे अपने यक़ीन पे ना यक़ीन हो जाए
तुम चाहते हो मुझको ,इस विश्वास पे ना विश्वास बढ़ जाए ..
हौसला ना मेरा बढ़ जाए ...
डरते हो तुम ख़ुद से ,की कही चूक गए जो प्यार निभाना,दिल मेरा ना छलनी हो जाए।
जब मुँह से कुछ नहीं कहते ..
क्यों आँखो से बयान करते हो ..?
उदास करते हो साथ छोड़ ,
फ़िर क्यों सपनो में आकर हाथ पकड़ा करते हो?
हँसते हो मुझपर ,रुलाते हो .
फिर नींद में आकर क्यों बाँहों में भरते हो?
कहते हो मुझसे प्यार नहीं
फिर क्यों फ़ोटो देख करते हो?
धुतकारते हो फिर ,क्यों आत्मा से पूजा करते हो ?
इतने सारे क्यों है ....
और एक ही है इसका उत्तर ...
क्योंकि तुमको मुझसे प्यार है
इसलिए ये सब करते हो ..
By Vandna Sonu

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