बेवक्त
By Kavita Batra
बेवक्त, बेवजह कोई अब होता नहीं,
कहने को तो मैला है यह जहां, पर अब कोई दिल से भी मैला रखता तो नही।
तुम मशहूर नहीं , तो भी कोई बात नहीं, पर अब कोई शोहरत के बिना ताल्लुक रखता भी तो नहीं।
बेवक्त, बेवजह कोई होता नहीं।
अदब , सलीके, जी हजूरी में गुज़ारी हे उम्र अपनी , पर किसी के छल कपट से जब लगे इल्ज़ाम, तब से मेरी सच्चाई को कोई मानता भी तो नहीं।
बेवक्त, बेवजह कोई होता नहीं।
एक ने ईंट कया मारी , तानों कि बारात मेरे गाँव में सब ने निकाल ही दी, ऐसा यकीन हो चला हे , जेसे अब ईस गांव में मुझे कोई अब पहचानता भी तो नहीं।
बेवक्त, बेवजह कोई होता नहीं।
सोचने पर मजबूर हो चले हें, बेवक्त, बेवजह जब कोई होता नहीं, तो क्यों दिल ऊदास होता हे , हम खुद ऊदास और औरों को खुश रखें ऐसी जरूरत भी तो नहीं।
बेवक्त, बेवजह कोई होता नहीं।
By Kavita Batra

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