बेटी हूँ, बोझ नहीं...
By Dr. Suboohi Jafar
बेटी हूँ मैं, बोझ नहीं हूँ,
माँ, मैं कोई प्रकोप नहीं हूँ,
मैं भी तेरा ही एक हिस्सा हूँ,
मैं भी हूँ सजीव, नहीं कोई क़िस्सा हूँ|
माँ तू भी तो स्त्री है, जननी है,
मैं भी उसी सृष्टि की एक धुरी हूँ,
जिस प्रेम का अंश है भैया मेरा,
मैं भी उसी पावन प्रेम की मूरत हूँ|
हर त्यौहार, हर पर्व पर,
जिस देवी की पूजा करते हो,
उसी का एक रूप हूँ मैं,
फिर क्यूँ मेरी हत्या करते हो|
ये तो भ्रूण हत्या की बात हुई,
पर मैं नहीं सुरक्षित, जन्म के बाद भी,
चारों ओर हैं गिद्ध हज़ार,
जो करते रिश्तों को शर्मसार|
और यदि मैं इन सबसे किसी तरह बच गई,
तो अगला पड़ाव हैं दहेज लोभी,
जो माँगते हैं धन अपार, बनते हैं अभिशापी,
इसमें मेरी ग़लती कहाँ थी, मैंने क्यों जान गँवाई|
हे मनुष्य, पहचान मुझे, मैं हूँ जगत जननी,
मैं ही देती सब संस्कार, मैं ही दादी, मैं ही नानी,
मेरी ही छाती से लगकर तुमने जीवनदान पाया है,
मेरेहीविभिन्नरूपोंमेंयहसंसारसमायाहै|
By Dr. Suboohi Jafar

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