बेटा: जवानी और जिम्मेदारी
Updated: Aug 21, 2025
By Amit Chandra Tiwari
नादानियों भरा बचपन भी,
अब जाने लगा है।
पापा का जूता भी,
अब पैर में आने लगा।
ये दौर जवानी का,
जिम्मेदारियों से भरने लगा है।।
अब तक छुपते थे जिस आंचल में,
उसके भी सवाल आने लगे हैं।
बहन की शादी, किराए के मकान के ख़र्चे
अब डराने लगे हैं।
ये दौर जवानी का हमें,
जिम्मेदारी को समझाने लगा हैं।।
उम्र का भी तकाजा है
अब काम में भी मन आधा है
होता नहीं रोजमर्रा काम भी अब
बेटा! घर में बहू को लाना है
ज़िन्दगी का यही फ़साना है,
नई जिम्मेदारी को गले लगाना है।।
अब खुद के लिए जीना
एक सपने सा लगता है
चोट बच्चे को लगती
दर्द खुद को होता है
भूलकर सारे ऐशो आराम
अब परिवार को आगे बढ़ाना है
ये दौर है जवानी का,
तो जिम्मेदारियों को निभाना है।।
By Amit Chandra Tiwari

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