बेचैनी।
By Kunal Verma
ये तब की बात हैं,
जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
रोना आता था, पर आसूं नहीं आते थे,
यारों के सामने मेरे, एक हसी में दब जाते थे,
अकेले कमरे में, में चीखता था, बिलखता था,
बेआवाज पूरी जान से, चिल्ला कर फिर सिसकता था,
पर वो आसूं कभी नहीं आते थे।
शिकायत का, रुसवाई का, हर हक का, वादा वफाई का
तुमने छीन लिया था
मेरे बिना जीना, बखूबी तुमने सीख लिया था
बांट दिया था तुमने खुद को टुकड़ों में,
एक हिस्सा मेरा जो था इस में, था कहीं बिखरा उन टुकड़ों में
पैरों तले रोंध दिया था
अपना रास्ता, अपना वास्ता, मोड़ लिया था
मेरे हसी, मेरे आसूं, को तनहाई में
किसी कोने की अंधियारी में
अकेला कहीं छोड़ दिया था।
ये तब की बात हैं,
जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत थी ...
ये तब की बात हैं,
जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
By Kunal Verma

Comments