बूढी मांयें
By Sadhana Joshi
गुजरे दिन के बिसरे पल हैं,
गुम हैं दुःख भी पलकें नम हैं।
गिरती उठती लहरें मनकी,
छिपती बुझती बिजली तन की।
झुरियां सजती मुखड़े पर है,
चुप है लव भी हिलते सिर हैं।
दिन का ढलना पत का झड़ ना,
बरसे बदरी मन ही मन में।
बिछुडी बिजुरी जब भी सबसे ,
सिमटी तन से वह भी तबसे।
खुदती रहती धरती नख से ,
कुछ ना कहती वह तो मुख से।
अबला बन के सहमी जग में ,
बहती अब भी ममता मनमें ।
By Sadhana Joshi

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