बूँद/Drop
By Vidit Panchal
वो बूँदबनी जब बदल से
चली धरती को वो इतरा के
थी हवा जो शीतल कर गयी उसको
हौले हौले से सहला के।
गिरते गिरते सोचा उसने
आखिर मेरा अस्तित्व है क्या ?
क्या पता के धरती सोख ले मुझको
या ले जाये बहती नदिया?
के अंत मेरा जो निश्चित है ,
तो क्यों मिलने जाऊ थल से?
क्या आश्रय मिल सकता है मुझको
पूछा उसने एक बदल से।
लेकिन फिर.....
दिखे उसे कुछ प्यासे ठूंठ
हरियाली को जो भूल चुके
बंजर भूमि पर तरसे लोग.......
खुशहाली को जो भूल चुके।
कुछ मरुस्थल जो की एक समय
जल से भर भर जाते थे
जाने कितने प्यासी पंथी की
मन की प्यासबुझाते थे।
कुछ सूखी आँखें , पथराई सी
जो उसकी रहे देख रहीं
फिर भी वे तैयार है की
एक साल का सूखा और सही।
पर मुझसा एक छोटा सा जलकण
क्या कर पाएगा इन सबका
मैं तो एक जरप्राय से रचना
न भिगो सकूं मैं इक तिनका।
कुछ और भी बूँदें दिखी उसे
अपनी ही सी उलझन में
विधि को चलें या मुखमोड़ें
ये प्रश्न उठा फिर से में।
वो ठूंठ अभी भी दिखते थे
प्यासी आँखें भी वैसी हीं
वो मरुस्थल भी फिर चीख उठे
अब धरती भी कुछ कहती थी।
कहने लगी ----
ऐ बूँद तू क्यों है संशय में?
तेरी तो ये गति निश्चित थी
इन प्यासों की तृप्ति हेतु ही
तू नीरद-नभ में जन्मी थी।
ना सोच के तू नाकाफ़ी है
इन सबके त्रास मिटाने को
है और भी बूँदें साथ तेरे
तेरा प्रतिमान बढ़ाने को।
तुझ जैसी जब कुछ और भी बूँदें
ओझल होती जाएँगी
ये ताल, ये नदियाँ, ये आँखें
क्या खुद की भी रह जाएँगी ?
क्या होगा तुझसे धरती का
वो धरा के गर्भ में है धरा
क्या करती है तेरा मिट्टी
उसमे मिलके तो देख ज़रा।
तू मिल जा एक दफा उनसे
जो जनहित हेतु है जन्मे
अस्तित्व और गति क संशय
ना और उठेंगे फिर मन में।
अब उलझन दूर हुई उससे
गति को जाने को गति मिली
प्यासी सी , तरसी सी थी धरती
वर्षा पर वह क्या खूब खिली।
मृत्यु से जीवन जुड़ा है कैसे
यह मिटकर ही जाना उसने
खुदके रूप को नदियों में
फूलों में हँसते देखा उसने।
यही जगत का नियम है
यही प्रकृति को भाये
अस्तित्व कभी नामरता है
बस रूपों में ढलता जाये।
वो बूँद अब कहीं लहरोंमें
मीठी सी कल- कल करती है
सौम्य सी मुस्कान लिए
नयी बूँद की बाट संजोती है।
By Vidit Panchal

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