बुलबुला
By Suman
वह तो मेरी दुनिया से बाहर ही है,
कभी एक आधी बार शायद किया हो उसने प्रवेश मेरी दुनिया में,
और अब बस दरवाजे पर खिंची रेखा से ही मुझ पर नज़र बनाए हुए हैं।
मैं करती जाती हूं अपने काम उसकी नज़रों तले,
वह कभी प्रेम नहीं करेगा
उसे बस देखने में मजा आ रहा है यह शांत संवेदनशील दुनिया वही दरवाजे से खड़े होकर।
पर मेरा बुलबुला धीरे-धीरे मज़बूत हो रहा है,
नहीं आ पाएगा कोई यूं ही उसे उंगली से तार-तार कर के,
बनाने पड़ेंगे उसे बुलबुले हज़ारों,
जब तक कि वो मेरे बुलबुले में मिलकर बड़ा और एक हो जाने जितनी क्षमता ना हासिल कर ले।
By Suman

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