बिन तेरे लगता है….
By Dr.Trupti Upadhyay
अब सुबह हो या शाम मंज़र एक सा लगता है ।
जाना पहचाना ये रास्ता ज्यादा ही अनजान लगता है।
अपनों में बस तू एक था, दुनिया अब पराई लगाती है।
आईना भी तेरी याद दिलाता है, वो भी धुंधला लगता है।
सब दौड़ रहे है अपनी रफ्तार से,बस कदमो ने मुझे जकड़ा सा लगता है।
देख रही हे दुनिया मुझे कुछ इस अंदाज़ से,जैसे मुझपे शक सा लगता है।
युही थोड़ा हमने कहा था की तुम ही हो मेरी दुनिया,
बिन तेरे अब मेरा जीना भी मौत सा लगता है।
By Dr.Trupti Upadhyay

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