बिंदी ।
Updated: Aug 21, 2025
By Kapinjal Vishwakarma
वह जो काला सा टीका है ,
तेरे माथे पर ,
जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।
ना हटा उसको ऐ जमाना उसके माथे से ,
कहीं टूट के बिखर न जाए सम मेरा ।
बड़ी तकल्लुफ से लगा होगा वह बिंदिया उसके माथे पर ,
जो हटा तो चेहरे की रंगत बिगड़ जाएगी ।
मैं चिल्ला उठूंगा उसको देखकर ,
कहीं खत्म ना हो जाए फसाना मेरा ।
वह जो काला सा टीका है ,
तेरे माथे पर ,
जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।
उसके आबरू से बिंदिया की झलक जो दिखती है मुझको ,
बड़ी हैरत है कि वह उसे पर ही सजाती है ।
गिर मिट गई वह देखने से मेरे ,
जो कुछ मेरा था वही खत्म होगा किस्सा मेरा ।
वह जो काला सा टीका है ,
तेरे माथे पर ,
जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।
यू तो कई रंग दिख जाते हैं उसके माथे पर ,
तमन्ना वह भी रखनी होगी फरमाइशों की ।
मगर जो काला है ,
वही होगा हिस्सा मेरा ।
वह जो काला सा टीका है ,
तेरे माथे पर ,
जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।
आईना नजर आता है उसे ,
जब सवारने का वह मन बनती होगी ।
सब कुछ सावरति होगी वह शिद्दत से ,
फिर जब माथे पर वह आती होगी ।
सोचती होगी कि काले से नजर ना लगे ,
जो लग जाए तो वह होगा नजरिया मेरा ।
वह जो काला सा टीका है ,
तेरे माथे पर ,
जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।
By Kapinjal Vishwakarma

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