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बिंदी ।

Jul 17, 2023
1 min read

Updated: Aug 21, 2025

By Kapinjal Vishwakarma



वह जो काला सा टीका है ,

तेरे माथे पर ,

जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।


ना हटा उसको ऐ जमाना उसके माथे से ,

कहीं टूट के बिखर न जाए सम मेरा ।


बड़ी तकल्लुफ से लगा होगा वह बिंदिया उसके माथे पर ,

जो हटा तो चेहरे की रंगत बिगड़ जाएगी ।

मैं चिल्ला उठूंगा उसको देखकर ,

कहीं खत्म ना हो जाए फसाना मेरा ।


वह जो काला सा टीका है ,

तेरे माथे पर ,

जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।


उसके आबरू से बिंदिया की झलक जो दिखती है मुझको ,

बड़ी हैरत है कि वह उसे पर ही सजाती है ।

गिर मिट गई वह देखने से मेरे ,

जो कुछ मेरा था वही खत्म होगा किस्सा मेरा ।


वह जो काला सा टीका है ,

तेरे माथे पर ,

जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।


यू तो कई रंग दिख जाते हैं उसके माथे पर ,

तमन्ना वह भी रखनी होगी फरमाइशों की ।

मगर जो काला है ,

वही होगा हिस्सा मेरा ।


वह जो काला सा टीका है ,

तेरे माथे पर ,

जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।


आईना नजर आता है उसे ,

जब सवारने का वह मन बनती होगी ।

सब कुछ सावरति होगी वह शिद्दत से ,

फिर जब माथे पर वह आती होगी ।

सोचती होगी कि काले से नजर ना लगे ,

जो लग जाए तो वह होगा नजरिया मेरा ‌।


वह जो काला सा टीका है ,

तेरे माथे पर ,

जिसको देखकर मचल जाता है जिया मेरा ।


By Kapinjal Vishwakarma



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