बावरी
By Vidhi Kotak
देखो न पिया, जग सतावे-
बावरी सी मैं, तो क्यों समझावे?
जब जुनून अनोखा रोके न रुके,
तो पहरे लगाने का क्या फ़ायदा;
जब ज़हन में पिया हों बस चुके,
तो सरहद बनाने का क्या फ़ायदा।
रोग भी मैं, रोगी भी मैं,
दवा बदलने का क्या फ़ायदा;
जब हर शायरी की रूह हो पिया तो,
क़लम बदलने का क्या फ़ायदा।
देखो न पिया, जग सतावे-
बावरी सी मैं, तो क्यों समझावे?
जब लफ़्ज़ हों सारे पिया-मिलन के तो,
धुन बदलने का क्या फ़ायदा;
सुधबुध सारी पिया घर भूली,
तो मशवरे बदलने का क्या फ़ायदा।
मैं कारी मेघा, पिया मेरा सावन,
आँगन बदलने का क्या फ़ायदा;
सीने पर पिया रंग चढ़ चुका हो,
तो चुनरी बदलने का क्या फ़ायदा।
देखो न पिया, जग सतावे-
बावरी सी मैं, तो क्यों समझावे?
By Vidhi Kotak

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