बाल मन में हिंसा
By Santosh Kumar Koli
वर्षा जल-सा निर्मल मन,
अक अधीन हुआ |
दूध झाग-सा राग,
मलिन,बेदीन हुआ |
भोर शफ़क़-सा जीवन,
सायंकालीन हुआ |
काग़ज़ निरंक-सा दिमाग़,
झाबर लवलीन हुआ |
मलाहत के मलिक हैं,
मन मत मुरझाने दो |
मानवता के भविष्य पर,
कालिख मत छाने दो |
चढ़ें,पुन: चढ़ें,पर चढ़ न सकें,
ऐसे तहख़ाने दो |
कोमल मन में,कोमल भावना,
जगमगाने दो |
तेरा ये वास नहीं,
क्यों जगर-मगर बेचती है ?
क्या शठ सौदागर से नज़र मिली,
जो मानवता गटकती है ?
क्या बरबादी से बर लिया,
जो मचलती,मटकती है ?
क्या हथियार रूप अज़मा रहा,
जो कोमल देह धधकती है ?
परिशुद्ध ज़मीन करो तैयार,
हिंसा गिरी गिरते ही नष्ट |
गुड़ाई,निराई,लवाई से,
सुवृत्त्त फसल पाओ अभीष्ट |
संस्कार,नैतिकता,मार्गदर्शन से,
करो परिपुष्ट |
चुकता होगा मानवता ऋण,
सवाल,सायल,सबूत मस्ट |
By Santosh Kumar Koli

Comments