बारिश और यादें
By Suraiya Akbari
आज फिर बेमौसम बारिश आई
बिल्कुल तेरी यादों की तरह, बेवक्त
मैं खिड़की के पास ही थी
उन बारिश की बूंदों को देख रही थी
वो हर एक बूंद हमारे गुजरे हुए पल की तरह था
पानीयों से नहीं यादों से भरा हुआ, बेइंतहा खुबसूरत
तभी वो बूंदें पेड़ के पत्तों पर जाकर बिखर सी गई
ये नाजुक सी पत्तीयाॅं उन यादों से भरे वजन को
सम्भाल नहीं पा रही थी
पर वो बूंदें अब भी उन पत्तों पर थी
बारिश तेज होने लगी, बूंदें मेरे चहरे पर पड़ने लगी
होठों पर एक मुस्कान सी आ गई
और आंखों में ठीक उस पानी की बूंदों की तरह
आंसू की बूंदें भी आ गई
बारिश मुझे भिगो चुकी थी
यादों से भी और आंखों से भी
फिर मैंने देखा, उन पत्तों से वो बूंदें खोने लगी
अब वह बारिश थमने लगी
ये खिड़की भी अब बंद हो गई
और सब कुछ पहले जैसा हो गया
पर एक पत्ते ने अब भी उन यादों को संजोए रखा है
मैंने अब तक खुद को तेरी यादों से भिंगोए रखा है।
By Suraiya Akbari

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