"बारिश"
By Dr.Varsha Khare
निदाघ की तप्त धूप से आकुल
धरा ने मर्म स्वर से पुकारा...
हे धराधर! अब तो बरसा दो वर्षा-झड़ी
सूनी है ये धरा...सूना है मेरा आंगन..
सूना है मेरा यह मन-मंदिर।
छलका दो वर्षा-अमृत
छाई हिय पर पियराई
और विथा है गहराई
अश्रु बन गए बैरी नैन के
जाने कौन दिशा मेह की...
कब से बैठा राह तके घन
प्रेम-पीयूष पाने को धरा का
करने लगा प्रणय निवेदन
प्रेम-वर्षा से भरे हृदय का..
हे! हरियाली चुनरी ओढे
सिंदूरी श्रृंगार किये प्रिया!
मैं स्याह घन का क्षुद्र टुकड़ा
क्या बाँधोगी मुझे प्रेम-बंधन में?
बरसा दूंगा तुम पर अपना जीवन सारा
विमुख करूँगा हर विथा जो तुम पर गहराई...
क्या दे पाओगी मुझको
अपने हृदय में स्थान?
हिय में घन के छिपे प्रेम से सरबर
धरा हो गई जलदप्रिया...
प्रणयी हो गये धरा-धराधर
बरस गई प्रेम झड़ी वर्षा की
धरा हो गई सिक्त रसा-सी!!!!
🌹🌹🌹💝
By Dr.Varsha Khare

Comments