बातें
By Bhoomi Shah
कुछ यूँ सुलझी सी थी , कुछ यूँ उलझी भी थी ,
खुदकी ही निगाह में कुछ यूँ तन्हा भी थी,
साथ थी कुछ खास थी, बात भी क्या शानदार थी,
बिन कहे बातें वह जानना तो जानती थी,
कुछ हसती कुछ हसाती पर फिर भी लोगो को पहचाननां वह जानती थी,
कहना वो चाहती फिर भी अक्सर चुप वह रहती थी,
बात कई थी कहने को फिर भी खुदसे ही सब सहती थी,
छुपे आसू अक्सर तकिए पर राहत यूँ पाते थे, पर हसी देना तो वह भी ना जानते थे,
आफत सी वह लड़की थी फिर भी खामोश वह रहती थी,
मासूम सी एक मुस्कान बिखेर खुशियाँ फैलती रहती थी,
ये राहे है जिन्दगी की दोस्त, चलना आसान तो नही,
चुप रहेना जरूरी हो फिर भी कहना आसान तो नही,
तु मांग के तो देख खुदा से, ना दे सके इतने मजबुर तो वोह भी नही।
By Bhoomi Shah

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