बात कोई और हो
Updated: Sep 3, 2025
By Pragya Sharma
तेरी कुरबत* के काबिल हो सकें तो बात कोई और हो
फिर हम-मुसाफिर* हो सकें तो बात कोई और हो
हैं मुकम्मल* तेरे बिन इस बात पे शक है नहीं
मुंतज़िर* भी हो सकें तो बात कोई और हो
कर चुके हैं तुमसे अब इक उम्र भर की जंग भी
तेरे मुहाफिज़* हो सकें तो बात कोई और हो
हों ये दुनिया आसमां सब मेरी खातिर फर्क क्या
हम तेरी खातिर हो सकें तो बात कोई और हो
By Pragya Sharma

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