बहू का अस्तित्व
By Preeti Bansal
अधिकांश लम्हों में खुद को खोजती मैं,
जिंदगी की धूप में खुद को खो बैठी मैं,
मेरा अस्तित्व केवल बहू के मायने खोजता रहा,
मगर वो समाज मुझे बेटी है बोलता रहा।
क्यों नहीं एक बहू का अस्तित्व समाज में?
क्यों नहीं उसका रुतबा बरकरार समाज में?
असीम समर्पण की छाया कहलाती वो,
मगर फिर भी समर्पण बेटी का ही कहलाये वो।
क्यों बेटी ही समर्पण की प्रतिमा कहलायी?
क्यों बेटी ही सर्वगुण संपन्न बन पायी?
क्यों बहू हमेशा अधूरी, असहाये दिखाई गई?
क्यों समाज ने उसे जीने नहीं दिया?
जिंदगी की खुशहाली में समाने नहीं दिया।
By Preeti Bansal

Comments