बहुत समय से
Updated: Jul 28, 2025
By Gyanesh Mohan
बहुत समय से सूरज का उदय-अस्त नहीं देखा,
बहुत समय से सितारों का टिमटिमाना नहीं देखा,
बहुत समय से किसी पौधे से पत्र-पुष्प का खिलना नहीं देखा,
बहुत समय से किसी पशु-पक्षी को कलरव-क्रिड़ा करते नहीं देखा,
बहुत समय से....
कैद हूँ अपने ही मस्तिष्क के कृत्रिम दुनिया में,
कैदी हूँ अपने ही गुलाम स्वभाव का,
बंधक हूँ अपने ही इच्छाओं के तिलिस्म का,
बहुत समय से....
जिसने जकड़ रखा है, मुक्त भी वही करेगा,
बशर्ते आप उन गंधर्व प्रश्नों में ही उत्तर तलाशें।
मस्तिष्क की कृत्रिम दुनिया निरर्थक इच्छाओं के सहारे टिकी होती है जिसे हमारा गुलाम स्वभाव एक तिलिस्म बना देता है।
यदि हम बस ‘मुक्ति’ की परम इच्छा को ही पालें तो कृत्रिम दुनिया का यह तिलिस्म हमारे मस्तिष्क में टिक नहीं पाएगा।
बहुत समय से यह संघर्ष निरंतर चला आ रहा है।
हमने अपने ही प्राकृतिक रूप के विरूद्ध एक युद्ध छेड़ रखा है,
बहुत समय से कृत्रिम स्वाभाविकता ने प्राकृतिक स्वाभाविकता पर सिकंजा कसा हुआ है।
जब भी हमें ऐसा भान होता हो तो बहुत समय बाद वो क्षण आया होता है कि हम मुक्ति को अपना परम लक्ष्य बना लें, और यह तभी संभव है जब हमारे हृदय में ‘करूणा’ का भाव हो।
करूणा का भाव प्राकृतिक रंगों के प्रति संज्ञात होने से आएगा, और यह संज्ञातता एक क्षण में नहीं परंतु बहुत समय (क्षणों) से किए अभ्यास के बाद ही आएगा।
By Gyanesh Mohan

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