बस की आपबीती
By Sanket Tandel
मैं ज़रिया बनी जिनकी मुसाफरी का
उन्होंने ही जलाया मुझे बीच राह में
हर मौसम में चाहे धूप हो या बारिश हो
जिनको मैंने मंज़िल पे पोहचाया
उन्होंने ही जलाया मुझे बीच राह में
मेरी खिड़कीओ पे बैठ के
जो हवाओ का, सफर का लुफ्त लेते रहे
उन्होंने ही जलाया मुझे बीच राह में
मुझमे सफर करके किसीने अपनी प्रेम
कहनी बनाई तो किसीने अपनी आपबीती सुनाई
उन्होंने ही जलाया मुझे बीच राह में
आखिर ए इंसान तूने बता ही दिया
की कितना मतलबी है तू जो
मेरे सारे एहसान भुला के
दंगो की आड़ मुझे ही जलाया बीच राह में
By Sanket Tandel

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