बलात्कार
By Arati Prakash Mahalle
कांच की नाजुक गुडीया, ना उसे यु बे-रेहमो की तर्हा सताया करो ...
जरासे दर्द से तुट कर तुकडो मे बिखर जायेगी ...
पर याद रखना उन तुकडो मे ही है, इतनी ताकद जो तुम्हे, एक ही कत्रे से लहुलुहान कर जायेगी ...
गुलाब की पंखुळी सा मिजाज उसका ...
पर तोडना चाहो तोह याद रखना, काटो की डाली सहारा है उसका ...
कभी तोह सोचो ना, क्या कसूर होगा उस नंन्ही सी बच्ची का ...
जो बलात्कार जेसा दर्दनाक, पेहलू बना होगा उस्के जिंदगी का हिस्सा ...
मेहेज आठ दस साल की, कच्ची उमर थी उसकी ...
फिर कैसे केह सकते हो बेशर्मो की तर्हा, रिझाने की अदाए थी उसकी ...
जरा तोह शर्म करो, शर्म भी मर जायेगी तुम्हारी बेशर्मी देख कर ...
और इंसानियत भी मर ही गई होगी, ए किस्से अखबारो मे सुन कर ...
समझा था तुम्हे बडे चाव से दुनिया ने, आने वाले सशक्त देश का आधारस्तंभ ...
पर तुम खुद को ही ना संभाल पाए हवस के चलते, और तुम संभाल लोगे देश, ए जाने कैसा पाला है सबने भ्रम ...
तुम तोह जेसे मर्द के भेस मे हिजडे निकले रे ...
करते हुये ए पाप, घर पर तेरी भी बेहेन है, ए खयाल एक भी बार तुझे क्यु नही सताया रे ...
ना सिल पाते है वोह घाव मन के कभी, जो बलात्कारी एक मासुम सी जान पर छोड जाता है ...
क्या फायदा फिर उस Candle मार्च का, काहा उससे उस लडकी को इन्साफ मिल पाता है ...
जब तक सहोगे जुर्म उन दो-कोडीके शक्सियतो का, ए दुनिया हिजडो का ही बाजार केह लाएगी ...
किस्सातोहतबजाकेखत्महोगाइसदुष्कर्मका, जबउनदरिंदोकोसरेआमफासीदिजाएगी ...
By Arati Prakash Mahalle

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