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बन जाओ तुम अजनबी

Dec 24, 2022
3 min read

By Sasmita Kumari Pradhan


ज़िन्दगी ने मुझसे आज पुछा :

क्या नाम देगी तेरे इस बदलते रिश्तों का,

जो अब तक हैं तेरा अपना पर कल बनेगा वो अनजाना |


मेरी विश्वास बोली :

नहीं है वो मेरा अनजाना ,

बनेगा वो मेरा अपना ,

पूरा होगा मेरा सपना ,

बनेगा ज़िन्दगी मेरा सुहाना |



ज़िन्दगी ने मुझे समझाया :

मत दौड़ उस अँधेरे के पीछे ,

जो नहीं देती ज़िन्दगी के मोड़ तुझे ;

मत मांग भीख उस ख़ामोशी से ,

जो नहीं समझ सके तेरे अहसासों को ;

मत बना जुबां को इतने सुंन ,

जो नहीं देते ज़िन्दगी जीने की धुन ;

मत भर ज़िन्दगी में शिशकी भरे दर्द ,

जो नहीं करते किसी के दिल को नरम ;

मत खींच अपने मस्तिक में ये चिंता को लकीर ,

जो नहीं मिला उसकी प्यार ने बना दिया तुझे फकीर |


मेरी ख़ामोशी बोली :

जिसके आँखों से मैंने ज़िन्दगी को देखा ,

जिसके सासों से मैंने ज़िन्दगी को जिया ,

जिसके संस्कारो का मुझ पर इतने उपकार ,

जिसके प्यार ने दिया ज़िन्दगी को नया आकार,

जिसे छूकर मैंने किया स्पर्श ,

जिसे सब कुछ किया अर्पण ,

जिसके प्यार में मैंने सब कुछ भुला दिया ,

जिसके चाह में मैंने सब कुछ लुटा दिया |


और वही ज़िन्दगी मुझे कहती है !

न जलाऊं मैं खुद को धुप में ,

न डुबाऊं मैं खुद को विहीन रूप में ,

न भरु आँखों मे वो ससक ,

न लाऊँ दिल में वो कसक ,

न बनाऊं खुद को वैरागिनी ,

न बनाऊं ज़िन्दगी को विकलांगिनी |


उसे देख होती थी मैं धन्य ,

उसे पाकर मैं समझती अपना पुण्य ,

पर ज़िन्दगी ने बना दिया मुझे शून्य |


दिए थे मैंने कितने क़सम ,

किये थे मैंने कितने रस्म ,

पर ज़िन्दगी में भर गए सिर्फ जख्म |

जिसकी इंतज़ार में बैठूं लिए कितने आस ,

भूल जाऊं समझकर उसे कुछ पल का आभास |

जिसे मानु मैं ज़िन्दगी की सारांश ,

उस ज़िन्दगी को नहीं मेरे भावों का अहसास ,

किया तुने फिर मेरे प्यार का उपहास |


ज़िन्दगी ने मुझे फिर समझाया :

समझती हूँ तेरे दिल के अरमान ,

जानती हूँ तेरे दिल के फरमान ,

नहीं चाहती तू कर प्यार का विनाश ,

जो कर देते हैं तुझे निराश ;

समझ जा ज़िन्दगी की आवाज़ ,

जो कहती हैं तुझसे बारम्बार ,

जिसे करती हैं तू इतना प्यार ,

वो बना रहा हैं अपना संसार ,

बनकर किसी ओर का आधार ;

सुन ले तू मेरी पुकार !

दे दे प्यार के रिश्तों को नया आकार ,

यही कहती है ज़िन्दगी मैं संसार ,

जब कभी उन आँखों से होगी तेरी टकरार ,

फिर याद आएगी वो प्यारी दास्तान ,

कैसे करेगी आँखे तेरी उसको इंकार ,

जिसका तू करती है अब भी इंतज़ार ,

होगा उस दिन बड़ा प्रतिघात ,

पर कैसे करेगी उसका प्रतिकार ,

जिसके प्रतिक से जलाया तूने वो प्रदीप ,

जिसके प्रतीत से जुड़ा है तेरा अतीत |


मेरी शिशकियाँ शिशक कर बोली :

समझ गयी मैं तेरी जुबां ,

करती हूँ मैं प्यार को प्रणाम ,

शायद ज़िन्दगी की यही हैं रीत ,

बन जा तू किसी ओर की प्रीत ,

भूलूँ मैं सारे कस्मे वादे ,

तोड़ू मैं सारे रिश्ते नाते ,

बना दूँ प्यार को एक स्मृति ,

करूँ ज़िन्दगी भर उसकी स्तुति ,

दे दूँ उसके रिश्ते को एक नाम ,

जिसके साथ बिताये मैंने कितने शाम ,

बन जा मेरे लिए तू अजनबी ,

जिसे नहीं जानती मैं कभी ,

दे दी रिश्तों को मैंने अजनबी के नाम ,

जिसमे न थे वो कोई शाम ,

न थी वो कोई रात ,

न था कभी तेरा साथ ,

बंद कर दिए मैंने दिल के कब्र में ,

वह सारे शाम , वह रात , वह अहसास ,

वह नाम, वह प्यार, वह अरमान ,

वह लहमा , वो शमा , वह पूजा

वह यादे , वह सपने, वह वादे

न दोहराऊं इसे ,दिल में रखू सब्र से |


दे दी मैंने अपने रिश्ते की आहुति ,

पर नहीं हैं मेरे साथ किसी की सहानुभूति ,

जो हैं मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी अनुभूति |


सचमुच में प्यार हैं तुम्हे अब भी ,

तो मान लो ये मेरा आदेश ,

बना लो तुम भी मुहे अजनबी ,

यही हैं मेरे दिल का सन्देश |


By Sasmita Kumari Pradhan



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