बन जाओ तुम अजनबी
By Sasmita Kumari Pradhan
ज़िन्दगी ने मुझसे आज पुछा :
क्या नाम देगी तेरे इस बदलते रिश्तों का,
जो अब तक हैं तेरा अपना पर कल बनेगा वो अनजाना |
मेरी विश्वास बोली :
नहीं है वो मेरा अनजाना ,
बनेगा वो मेरा अपना ,
पूरा होगा मेरा सपना ,
बनेगा ज़िन्दगी मेरा सुहाना |
ज़िन्दगी ने मुझे समझाया :
मत दौड़ उस अँधेरे के पीछे ,
जो नहीं देती ज़िन्दगी के मोड़ तुझे ;
मत मांग भीख उस ख़ामोशी से ,
जो नहीं समझ सके तेरे अहसासों को ;
मत बना जुबां को इतने सुंन ,
जो नहीं देते ज़िन्दगी जीने की धुन ;
मत भर ज़िन्दगी में शिशकी भरे दर्द ,
जो नहीं करते किसी के दिल को नरम ;
मत खींच अपने मस्तिक में ये चिंता को लकीर ,
जो नहीं मिला उसकी प्यार ने बना दिया तुझे फकीर |
मेरी ख़ामोशी बोली :
जिसके आँखों से मैंने ज़िन्दगी को देखा ,
जिसके सासों से मैंने ज़िन्दगी को जिया ,
जिसके संस्कारो का मुझ पर इतने उपकार ,
जिसके प्यार ने दिया ज़िन्दगी को नया आकार,
जिसे छूकर मैंने किया स्पर्श ,
जिसे सब कुछ किया अर्पण ,
जिसके प्यार में मैंने सब कुछ भुला दिया ,
जिसके चाह में मैंने सब कुछ लुटा दिया |
और वही ज़िन्दगी मुझे कहती है !
न जलाऊं मैं खुद को धुप में ,
न डुबाऊं मैं खुद को विहीन रूप में ,
न भरु आँखों मे वो ससक ,
न लाऊँ दिल में वो कसक ,
न बनाऊं खुद को वैरागिनी ,
न बनाऊं ज़िन्दगी को विकलांगिनी |
उसे देख होती थी मैं धन्य ,
उसे पाकर मैं समझती अपना पुण्य ,
पर ज़िन्दगी ने बना दिया मुझे शून्य |
दिए थे मैंने कितने क़सम ,
किये थे मैंने कितने रस्म ,
पर ज़िन्दगी में भर गए सिर्फ जख्म |
जिसकी इंतज़ार में बैठूं लिए कितने आस ,
भूल जाऊं समझकर उसे कुछ पल का आभास |
जिसे मानु मैं ज़िन्दगी की सारांश ,
उस ज़िन्दगी को नहीं मेरे भावों का अहसास ,
किया तुने फिर मेरे प्यार का उपहास |
ज़िन्दगी ने मुझे फिर समझाया :
समझती हूँ तेरे दिल के अरमान ,
जानती हूँ तेरे दिल के फरमान ,
नहीं चाहती तू कर प्यार का विनाश ,
जो कर देते हैं तुझे निराश ;
समझ जा ज़िन्दगी की आवाज़ ,
जो कहती हैं तुझसे बारम्बार ,
जिसे करती हैं तू इतना प्यार ,
वो बना रहा हैं अपना संसार ,
बनकर किसी ओर का आधार ;
सुन ले तू मेरी पुकार !
दे दे प्यार के रिश्तों को नया आकार ,
यही कहती है ज़िन्दगी मैं संसार ,
जब कभी उन आँखों से होगी तेरी टकरार ,
फिर याद आएगी वो प्यारी दास्तान ,
कैसे करेगी आँखे तेरी उसको इंकार ,
जिसका तू करती है अब भी इंतज़ार ,
होगा उस दिन बड़ा प्रतिघात ,
पर कैसे करेगी उसका प्रतिकार ,
जिसके प्रतिक से जलाया तूने वो प्रदीप ,
जिसके प्रतीत से जुड़ा है तेरा अतीत |
मेरी शिशकियाँ शिशक कर बोली :
समझ गयी मैं तेरी जुबां ,
करती हूँ मैं प्यार को प्रणाम ,
शायद ज़िन्दगी की यही हैं रीत ,
बन जा तू किसी ओर की प्रीत ,
भूलूँ मैं सारे कस्मे वादे ,
तोड़ू मैं सारे रिश्ते नाते ,
बना दूँ प्यार को एक स्मृति ,
करूँ ज़िन्दगी भर उसकी स्तुति ,
दे दूँ उसके रिश्ते को एक नाम ,
जिसके साथ बिताये मैंने कितने शाम ,
बन जा मेरे लिए तू अजनबी ,
जिसे नहीं जानती मैं कभी ,
दे दी रिश्तों को मैंने अजनबी के नाम ,
जिसमे न थे वो कोई शाम ,
न थी वो कोई रात ,
न था कभी तेरा साथ ,
बंद कर दिए मैंने दिल के कब्र में ,
वह सारे शाम , वह रात , वह अहसास ,
वह नाम, वह प्यार, वह अरमान ,
वह लहमा , वो शमा , वह पूजा
वह यादे , वह सपने, वह वादे
न दोहराऊं इसे ,दिल में रखू सब्र से |
दे दी मैंने अपने रिश्ते की आहुति ,
पर नहीं हैं मेरे साथ किसी की सहानुभूति ,
जो हैं मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी अनुभूति |
सचमुच में प्यार हैं तुम्हे अब भी ,
तो मान लो ये मेरा आदेश ,
बना लो तुम भी मुहे अजनबी ,
यही हैं मेरे दिल का सन्देश |
By Sasmita Kumari Pradhan

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