बदली नज़र
By Shuaib Ahmad
क्या करूं अब समझ नही आता कि तुमसे इश्क हो गया,
एक लम्हा भी तुमसे मेरा खाली नही जाता कि तुमसे इश्क हो गया।
ज़ाहिर नही होगा ये ज़बान से और हो भी क्यों आखिर
मेरी आंखे मेरी सांसें चीख रही है की तुमसे इश्क हो गया।
क्या तुमने सीखा नही पढ़ना बिन स्याही का अफसाना
जहां बैठ तुमको सोचा वहां लिख आया कि तुमसे इश्क हो गया।
किसी दिन मेरे पास बैठना, सिखाऊंगा तुमको चांद से बाते करना
हां वही बाते जो चांद रोज कहता है कि तुमसे इश्क हो गया।
ये तमन्ना नही कि तुम सीने से लगाओ हमको बस
अदब से सर झुका लेना जब सुनो की तुमसे इश्क हो गया।
यूं तो हम तेरे काबिल नही है जानते है मगर
करें क्या जो अब तुमसे इश्क हो गया।
तुम सामने हो तो दिल होश खो देता है ना हो तो बेचैनी
ये कैसी कैफियत है जिस्म की, कि तुमसे इश्क हो गया।
By Shuaib Ahmad

Comments