बटोही
By Aditya Jha
बटोही तू आया कहाँ से
तू जाये कहाँ रे,
ये भेद न जाने कोई ..।
निपट अँधेरे निकला घर से
लादे पीठ पे गठरी,
पग तेरे बढ़ते ही जाते ,
छोड़ के नगर और डगरी ।
बच्चे ने थे हाथ हिलाये
माता की आँखें रोई...........।
दूर देश में काम में डूबा
भूला अपना गॉँव,
टूसे बौरों में कुहकती कोयलिया,
और पीपल की छांव ।
न जाने अब कब हो जाना
मनमा खोई -खोई............।
लगे जग सूना जीवन सूना,
सूना मन का कोना कोना,
दिन बीते भाग दौड़ में
एकांत निशा में चुपके रोना ।
पनघट और चौपाल की यादें,
उमड़ घुमड़ कर आई...........।
ये ही है जीवन की यात्रा
जिसका ओर न छोड़ ,
न जाने कहाँ, कब टूटे
सांसों की ये डोर ।
भवसागर के पार् मिलेगा
जो कुछ तुमने बोई.........।
By Aditya Jha

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