बच्चों का मनुहार
By Sarita Jain
भोला था कितना बच्चों का मनुहार,
माँ को याद दिला रहे थे बार-बार,
लिखती हो आप सबके लिए हर बार,
क्यों नहीं लिखती अपने लिए भी एक बार।
बच्चों को समझाना चाह रही थी बार-बार,
दूसरों को तो कर देते हैं चंद पंक्तियों में अभिव्यक्त,
पर बहुत मुश्किल है स्वयं को करना अभिव्यक्त।
मैं हूँ एक नारी, विस्तृत रूपों की धारी
अपने किस रूप को अभिव्यक्त करूं ये काम है अति भारी।
किसका विवेचन करूं, करूं किस का व्याख्यान,
नारी का तो हर रूप ही है महान।
उसके हर रूप में छिपी होती है उसकी पहचान।
नहीं है कोई भी उसके विविध रूपों से अनजान।
कैसे पूरा करूं मैं तुम्हारा ये मासूम-सा फरमान।
मैं नहीं बनाना चाहती अपनी कोई अलग पहचान,
प्रवाहित होती रहूं सदा दूसरों के लिए सरिता का तो है बस यही काम।
सरिता का तो है बस यही काम।।
By Sarita Jain

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