बचपन वाले सारे इतवार खो गए
By Ashish Nagori
बचपन वाले सारे इतवार खो गए
क्लास की आखिरी बेंचऔर मेरे यार खो गए
स्कूल नहीं जाने को रोज़ बहाना होता था
ठंडे ठंडे पानी से रोज़ नहाना होता था
माँ मेरी, रोज़ सवेरे मुझको रेडी करती थी
ढेर सारा प्यार, छोटे से टिफिन में भरती थी
मेरी टिफिन वाली पूरी और अचार खो गए
बचपन वाले सारे इतवार खो गए
दो चोटी वाली लड़की थी जो कार से आया करती थी
हम अक्सर हिन्दी घिसते थे, वो अंग्रेजी ज़ाया करती थी
साइकिल वाले दोस्त यार, सब उस पर पूरे लटटू थे
वो भी सबको अपने इशारों पर नचाया करती थी
कार के काले धुएँ में सारे पैडल वाले प्यार खो गए
बचपन वाले सारे इतवार खो गए
हमको इंसान बनाने की सभी कोशिशें कर डाली सुबह शाम सब टीचर ने, ठंडी आहैं भी भर डाली क्लास की खिड़की के बाहर, खुशहाल सा जीवन दिखता था टीचर का दिया ज्ञान बस पल दो पल ही टिकता था वो टीचर की कोशिशें और संस्कार खो गये बचपन वाले सारे इतवार खो गए नाम कमाने ऐसे निकले, अपनी पहचान भूल गये दुनिया की ख़ाक छान ली, माँ बाप का मकान भूल गये अपने शहर का तो हमको, पिनकोड भी याद नहीं सड़क के कोने वाली, टोफ़ी की दुकान भूल गए वो संतरे की गोली, नकली नोटों के हार खो गए बचपन वाले सारे इतवार खो गए
By Ashish Nagori

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